दिल्ली अब टेक्नोलॉजी के एक अहम सेक्टर में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाने की तैयारी कर रही है। राजधानी सरकार एक नई सेमीकंडक्टर पॉलिसी पर काम कर रही है, जिसका मकसद दिल्ली को चिप डिजाइन, रिसर्च और इससे जुड़े कामों का बड़ा केंद्र बनाना है। इस पहल का सीधा फोकस निवेश लाना, नई कंपनियों को जोड़ना और युवाओं के लिए रोजगार के मौके बढ़ाना है।
क्यों अहम है सेमीकंडक्टर सेक्टर
आज के दौर में सेमीकंडक्टर लगभग हर आधुनिक मशीन और डिवाइस की जान माने जाते हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, कार, अस्पतालों के उपकरण, ट्रांसपोर्ट सिस्टम, सैटेलाइट, डिफेंस और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे सेक्टर इन पर निर्भर हैं। यही वजह है कि चिप इंडस्ट्री अब सिर्फ टेक सेक्टर की बात नहीं रही, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हो चुकी है।
दिल्ली का फोकस फैब यूनिट से ज्यादा डिजाइन और रिसर्च पर
दिल्ली की रणनीति थोड़ी अलग नजर आ रही है. जहां कई राज्य फैब्रिकेशन यूनिट लगाने की दिशा में काम कर रहे हैं, वहीं दिल्ली अपने मजबूत पक्ष पर ध्यान दे रही है। इसमें चिप डिजाइन, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी, रिसर्च, इनोवेशन और एडवांस पैकेजिंग जैसे हिस्से शामिल हैं। साथ ही Assembly, Testing, Marking and Packaging और Outsourced Semiconductor Assembly and Testing जैसे सेगमेंट पर भी काम करने की योजना है। सरकार की कोशिश है कि फैबलेस कंपनियां, स्टार्टअप्स और भारत में विस्तार चाहने वाली ग्लोबल फर्म्स दिल्ली की तरफ आकर्षित हों।
निवेश बढ़ाने के लिए इंसेंटिव पर काम
सरकार इस सेक्टर में कंपनियों को खींचने के लिए कई तरह के सपोर्ट पर विचार कर रही है। इनमें कैपिटल सब्सिडी, इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट और ऑपरेशन कॉस्ट कम करने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। साथ ही यह पॉलिसी केंद्र की India Semiconductor Mission के साथ तालमेल में तैयार की जा रही है, ताकि निवेशकों का भरोसा बढ़े और काम में दोहराव न हो।
युवाओं के लिए खुल सकते हैं नए मौके
इस पॉलिसी का एक बड़ा असर रोजगार और स्किल डेवलपमेंट पर पड़ सकता है। सरकार का मानना है कि आने वाले समय में चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर रिसर्च और एडवांस पैकेजिंग जैसे क्षेत्रों में प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ेगी। इसी वजह से स्किलिंग, इंडस्ट्री-अकादमिक पार्टनरशिप और टारगेटेड ट्रेनिंग प्रोग्राम्स पर जोर दिया जा रहा है, ताकि भविष्य के लिए तैयार वर्कफोर्स बनाई जा सके।
देश की बड़ी रणनीति से जुड़ा है यह कदम
यह पहल सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारत की बड़ी रणनीति का हिस्सा भी देखा जा रहा है। कोविड के दौरान वैश्विक सप्लाई चेन में आई रुकावट ने दिखाया था कि कुछ गिने-चुने देशों पर ज्यादा निर्भरता कितनी बड़ी समस्या बन सकती है। भारत अब इस निर्भरता को कम करना चाहता है और घरेलू क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत 2029 तक अपनी सेमीकंडक्टर जरूरत का 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा देश में पूरा करने का लक्ष्य रख रहा है।
दिल्ली क्या वाकई नया टेक हब बन सकती है
सीधी बात करें तो दिल्ली अब सिर्फ प्रशासन और राजनीति की राजधानी बनकर नहीं रहना चाहती। वह टेक्नोलॉजी और इनोवेशन के बड़े नक्शे पर भी अपनी जगह बनाना चाहती है। अगर यह पॉलिसी सही तरीके से लागू हुई, तो दिल्ली आने वाले समय में देश के सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का मजबूत हिस्सा बन सकती है। इसके साथ निवेश, जॉब्स और टेक ग्रोथ—तीनों को नया बूस्ट मिल सकता है।






